धर्म-कर्म मानवता है
सबसे बड़ा धर्म, संपूर्ण मानव जाति का उत्थान ही एकमात्र लक्ष्य प्रत्येक मनुष्य की अपनी एक धार्मिक पहचान होती है। कोई हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई धर्म को मानने वाले के यहां जन्म ले सकता है, परंतु हमारा संविधान उसे अधिकार देता है कि यदि उसकी आस्था में परिवर्तन हो जाए एवं यदि वह किसी अन्य धर्म में विश्वास करने लगे तो अपना धर्म बदल सकता है। आजकल ‘लव जिहाद’ शब्द रोज सुनने को मिल रहा है, जिसका अर्थ है कि किसी एक धर्म का पुरुष अपने को किसी और धर्म का बताकर किसी महिला या लड़की से रिश्ता कायम करता है एवं बाद में असलियत सामने आने पर उस लड़की को जबरन अपने धर्म का अनुयायी बनाने की कोशिश करता है या बनाता है।
औपचारिक रूप से किसी व्यक्ति के द्वारा किसी धर्म को अपना लेने मात्र से वह किसी अन्य धर्म का अनुयायी नहीं बन सकता है। धर्म तो मनुष्य की अंतरात्मा में गहराई से अंतर्निहित होता है। धर्म का संबंध मनुष्य के विश्वास से होता है। उसकी विचारधारा, पसंद-नापसंद, सही-गलत, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय को परखने की अंतर्दृष्टि में धर्म बसा हुआ होता है। दुनिया का कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो अपने अनुयायी को झूठ बोलने, धोखा देने, दूसरों के अधिकारों को छीनने एवं हिंसा करने की सीख देता हो। वास्तव में ये कृत्य धाíमक मतांधता के परिणाम हैं। यह परमेश्वर के फैसलों से असहमति व्यक्त करना है।
धर्म क्या है?
धर्म ( पालि : धम्म ) भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। … धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘धारण करने योग्य’ सबसे उचित धारणा, अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिये। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं। “सम्प्रदाय” एक परम्परा के मानने वालों का समूह है।
धर्म क्यों जरूरी है?
धर्म हमारे शरीर से आत्मा तक की दूरी तय करने की विधि ही धर्म है। पर ये हमारे लिए जरूरी है। क्यूंकि हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य ये जानना है कि हमारा लक्ष्य क्या है। हम क्यों पैदा हुए है।
धर्म की उत्पत्ति कैसे हुई?
हालांकि धर्म के जानकारों अनुसार वर्तमान में जारी इस धर्म की शुरुआत प्रथम मनु स्वायम्भुव मनु के मन्वन्तर से हुई थी। ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापनाहुई।
सामान्य धर्म क्या है?
सामान्य तौर पर धर्म के दो प्रकार हैं। पहला स्वाभाविक धर्म और दूसरा भागवत धर्म। स्वाभाविक धर्म का अर्थ है जिस पर अमल करने से दैहिक संरचना से संबंधित कार्यो की पूर्ति होती है, यानी आहार, निद्रा और मैथुन आदि क्रियाएं। भागवत धर्म वह है जो मनुष्य को दूसरे जीवों से पृथक करता है।
धर्म का आधार क्या है?
किन्तु तुमने धर्म के उन उन पाँच आधारों को हृदय में स्थान दिया । त्याग बुद्धी को स्थिर करता है, धीरज मन को स्थिर करता है, प्रेम हृदय को स्थिर करता है और समर्पण शरीर के आवेगों को शान्त कर शरीर को स्थिर करता है , और न्याय ! न्याय आत्मा को स्थिर करता है ।
धर्म के कितने स्वरूप है?
स्थूल स्तर पर हम धर्म को दो रूपों में देख सकते हैं। एक, वह जो देश, काल, पात्र के अनुरूप आचार संहिता प्रस्तुत करता है। धर्म का यह स्वरूप देश, काल और पात्र का सापेक्ष होता है। दूसरा स्वरूप वह है जो मूल तत्त्व है, शात है, अजर, अमर, अपरिवर्तनीय व अविनाशी है।
सभी धर्मों का मूल क्या है?
तत्वत्: सभी धर्म अनादि है अर्थात् एक ही अनादि धर्म की शाखायें हैं । उनका पोषण जिस वस्तु से होता है वह जड़ तत्व है । वही धर्म सच्चे ठहर सकते हैं जो सत् पर अवलम्बित हैं ।
कर्म क्या है ?
गीता ३.२७ अनुसार “जब मनुष्य ‘मैं करता हूँ। ‘ ऐसा मानता है।” तो उसके किये गए क्रिया को कर्म कहेंगे। अतएव जब मनुष्य स्वयं कर्ता बनकर अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा क्रिया करके किसी कर्म को करता है, तभी कर्म बनता है और फिर इसी कर्म का संग्रह होता है जिसे कर्म-संग्रह कहते है।
कर्म के प्रकार
इस प्रकार कर्म तीन प्रकार के होते है – १. संचित कर्म २. प्रारब्ध कर्म और ३. क्रियमाण कर्म।




