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देवी जी के बारे में

सादगी और आलौकिक तेज की प्रतिमूर्ति पूज्या साध्वी भाग्यश्री देवी जी का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के छोटे से गांव पूंछ में सन् 1999 में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पांच बहनों में साध्वी जी पांचवे नंबर की हैं।
उनका रुझान बाल्यकाल से धर्म और अध्यात्म के प्रति रहा है। अपनी विलक्षण मेद्या शक्ति और सुरीले कंठ के कारण वे महज पांच साल की उम्र में ही लोगों के बीच कौतुहल का केंद्र बनने लगी थी। धार्मिक भजनों को गुनगुनाते हुए श्रीकृष्ण के प्रति उनके मन में भक्ति का ऐसा अंकुरण हुआ कि वे बचपन के खेल-कूंद से दूर होकर भगवत प्राप्ति के लिए ललायित रहने लगीं। जब साध्वी भाग्यश्री देवी जी 6 वर्ष की आयु पूर्ण कर रही थीं, तभी उनके जीवन में एक चमत्कारिक घटना हुई। एक दिन जब वे रेत के ढेर में खेल रहीं थी, तभी उनके हाथ में अचानक से ठाकुर जी की मूर्ति आ गई। उसकी रेत साफ करके वे अपने घर ले आईं और ठाकुरजी को अपने साथ हमेशा ही रखने लगीं। यह घटना संयोग थी या फिर दैवीय चमत्कार, कह पाना संभव नहीं है, लेकिन इस घटना के बाद से पूज्या भाग्यश्री जी में जो आलौकिक परिवर्तन आया, उससे पता चलता है कि ठाकुरजी की विशेष कृपा उनके ऊपर हुई। महज 7 वर्ष की अवस्था में ही पूज्या भाग्यश्री देवी जी श्रीमद् भागवत और श्रीरामचरित मानव पर प्रवचन करने लगीं। बाद में वे भागवत कथाएं और रामकथाओं के मंचों को सुशोभित करने लगीं। यह सिलसिला आज तक चला आ रहा है।

देश के अनेक राज्यों जैसे राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, मप्र, झारखंड, दिल्ली, मुंबई, यूपी सहित विदेशों में भी साध्वी पूज्या भाग्यश्री देवी की कथाएं हो चुकी हैं। आने वाले महीनों में पूज्या भाग्यश्री जी की श्रीमद भागवत कथाएं और श्रीराम कथा यूरोपीय देशों में प्रस्तावित हैं।